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Thursday, August 23, 2012

क़ानून का अंधापन........

कहते हैं क़ानून अँधा होता  है | हमने एक पुलिस वाले से पूछा ही लिया कि भाई क़ानून अँधा कैसे हो सकता है ? 
वो बोला "बस इत्ति सी बात समझ ना आई ? क़ानून खुद कभी नहीं देख सकता, उसे तो दिखाना पड़ता है और जो दिखाया जाता है वही उसे नज़र आता है |" समझे कुछ ? 
हमने कहा- 'भाई ! समझ में तो आ गया पर ये दिखाने- विखाने का काम कौन करता है ?"  
'हम खाक़ी वर्दी वाले हैं ना इस काम के लिए ! वो पुलिस वाला बोला | 
हमने कहा- क्या ये ज़रूरी है ? चलो मान लिया परंतु एक बात है हमको दिख रहा हो और खाक़ी वर्दी वाले को नहीं दीख रहा हो तो ? 
पुलिस वाला झट से बोला- तो आप क्या क़ानून को अपने हाथ में लेंगे ? 
"क़ानून भी कभी किसी के हाथ आया है आज तक ?" हमने कहा | 
पुलिस वाला ज़ोर से हँसा तथा बोला- भाई साहब ! किस जमाने की बात करते हो ? आज क़ानून बड़े बड़े नेताओं के हाथों में है, बड़े बड़े अभिनेताओं के हाथों में है, बड़े बड़े कार्पोरेटेस के हाथों में है | उसे वही देखना पड़ता है जो वो दिखना चाहते हैं | 
'तो आप क्या करते है ?' हमने पूछा | 
'हम तो बस खड़े खड़े सब कुछ देखते हुए भी अनदेखा कर देते हैं'- पुलिस वाला बोला | 
'खैर छोड़ो ! गोपाल कांडा के केस के बारे में क्या राय है ? हमने पूछा | 
'राय क्या है ? हम देखने की कोशिश कर रहे हैं पर नज़र कुछ आ नहीं रहा है |"......... पुलिस वाला बोला | 
हमें सारी बात करने के बाद चक्कर आने लगे हम समझ ही नहीं पाए कि क़ानून अँधा है या पुलिस ? धन्यवाद |
-Priyadarshan Shastri

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